बिट्ठ शिल्पकारों द्वारा जंद्यो आंदोलन की छ्वीं किलै नि लगांदन
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कथा - भीष्म कुकरेती
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दिखे जाव तो सलाण म गढ़देश गाँव म शिल्पकारों द्वारा जंद्यो पैरण आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन से बि बड़ आंदोलन च किंतु ना ही शिल्पकार खुलेआम अर बिट्ठ चुपके से बि जंद्यो आंदोलन की छ्वीं लगांदन।
शुरू बिटेन हिन्दू समाज लचीला समाज च। समय समय पर सुधारवादी कुछ न कुछ सुधार लाणा रैन अर हिन्दू समाज तै सदा जीवंत समाज बणाना रैन। जातीय भेदभाव व भूमि पर कुछ लोगों अधिकार एक बड़ी कमजोरी हिन्दू समाज की च।
ब्रिटिश काल म हिन्दू समाज म भौत सा सुधारवादी आंदोलन चलिन। उत्तराखंड म शिल्पकार आत्मधिकार संबंधी एक बड़ो आंदोलन चल -आर्यसमाज आंदोलन। भौत सा आर्यसमाजी सामजिक कार्यकर्ताओं न शिल्पकारों तैं प्रेरित कार कि जातीय जकड़न छोड़ि आर्यसमाजी बण जाओ अर वैदिक कर्मकांड तै अपनाओ जन हवन करण , जंदेउ धारण करण अर मूर्ति पूजा क सर्वथा त्याग।
गढ़देश गाँव म बिट्ठ बि रौंद छा तो शिल्पकार बि। शिल्पकारों म ल्वार , टमटा , सुनार , काष्ठकर्मी छा तो सामान्य श्रमिक बि। छुवाछूत अंदादुंद अर छुवाछूत जीवित रखणो ततकथित उच्च वर्ग भौत सा सामजिक , वैदिक नियमों क सौं घटि या उदारण दींदा रौंद छा।
इनम गढ़वाल म आर्य समाज आंदोलन न शिल्पकारों तै प्रभावित तो कार च किन्तु तै बिट्ठ वर्ग म खलबली बि मचाई।
गढ़देश गाँव म जब बिंजोली चौंदकोट का गंगाराम आर्य जन्म चक्षुविहीन , कांडी उदयपुर का उमराव सिंह नेगी क प्रयास से शिल्पकारों न आर्य समाज अपनाणो निश्चय कार। गंगाराम आर्य न आर्य समाजी बामण की भूमिका निभाई अर सब तै हवन करण सिखाई व सब मर्दों तेन जंद्यो पेराई, अर जप करणों कुण गायत्री मंत्र ओम भूर्भुव स्व: तत्सवि तुवरिण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् रटाई। केवल रैजा आर्य जो तिसर पास छा न इ मंत्र याद कार साक तो रैजा जी तै ागधदेश गांव म समाज क बामण अर्थात प्रतिनिधि घोसित करे गे। रैजा जी म कुछ अतिरिक्त जंद्यो बि दिए गेन कि
गढ़देश गाँव म लोहार अर टमटों न पैली बार जंद्यो धारण कार तो सदियों से जंद्यो से बंचित ये समाज म नई ऊर्जा संचारित हूण लग गे। ऊर्जा, प्रसन्नता इन छे जन बुल्यां भारत म स्वतंत्रता ऐ गे हो। सामान्य जिंदगी उत्साह , प्रसन्नता , अति आनंद म परिवर्तित ह्वे गे अर घर घर म स्वाळ -पक्वड़ पकाये गेन अर क्वी बि शिल्पकार तेल -घी -गुड़ हेतु मांगणों बिट्ठण नि गे जनकि सामान्य त्यौहार म बिट्ठों से माँगि -देखि स्वाळ -पक्वड़ पकाये जांद छा। शिल्पकार ही जणदा छा तेल , आटो , दाळ मसाला मंगण म क्या क्या अपमान साहन करण पड़दो छौ। त्यौहार से पैलि स्वाळ -पक्वड़ हेतु सामान निडाण म महिलाओं तै सबसे बिंडी अपमान साहन करण पोड़द छौ। कुछ शिल्पकार महिला बिट्ठों क अग्रिम श्रम कौरी निश्चित कर लींदा छा कि त्यौहार से पैल ठाकुर (बिट्ठ ) कथगा तेल , गुड़ , ग्युं क आटो , मसाला द्याला। निथर भविष्य म श्रम करणों निश्चित करे जांद छौ अर द्वी अवसर पर इन न तन म अपमान तो मिल्दो ही छौ शिल्पकारों तै। दिखे जाय तो यु शिल्पकारों अपमान करण एक प्रकारौ नियम ही मने जांद छौ।
आज जंद्यो पैरणों प्रसन्नता म सभी घर म स्वाळ -पक्वड़ पकिन किन्तु सहकारिता बल पर स्वाळ -पक्वड़ पकाये गेन। कै बि शिल्पकार तै तेल -मसाला -आटो बान कै बि दिवा या निदिवा बिट्ठ क देळिम मंगणों खड़ हूणो आवश्यकता नि पोड़। अपने आप म या बि सहकारिता क क्रान्ति ही छे शिल्पकारों मध्य। समाज क प्रत्येक वर्ग , छुट -बड़ , बूड -बुड्या -बुडड़ी -युवती , बैक स्त्री मंगलमय समय क ही बात करणा छा कि हम शिल्पकारों न जप , , हवन कर्मकांड कार अर जंद्यो पैर। संभवतया सदियों से मूल अधिकारों से बंचित समाज तै इन लग कि यु समाज अब कुछ सीमा तक बिट्ठ समाज क नरोबर ऐ गे। उमंग , भविष्य म बिट्ठ सामानता क सुपिन , उत्साह सरा शिल्पकारटोला म पसर गे छौ। युवाओं म तो बिंडी उमंग उत्साह , ऊर्जा आयीं छे तो ऊन सरसरी म मंडाण बि उरे दे। आज क पाठकों व लोगों तै बचकाना लगल किंतु ऊं तै पूछो जौं तैं प्रत्येक क्षण छुवाछूत क दंश भुगतण पोड़ हो। जंद्यो पैरण से छुवाछूत समाप्त नि ह्वे ह्वेलि किंतु शिल्पकारों म अपार आत्मभिमान व आत्म विश्वास तो आयी च तभी तो स्वतः ही त्यौहार को वातावरण बण गे छौ। यु बि निर्णय ह्वे कि रात दुयु जळाये जाल अर ये वातावरण म दिवाली त्यौहार जन वातावरण बि जुड़े जाओ। कुछ युवा तो मथि डांड चल गेन कि कुंळैक दिवळ छिल जळैक दिवाली मनये जाय।
इख शिल्पकार टोला म ाँद , अपार प्रसन्नता , आशा प्रसारित हुईं छे तो मथि बिट्ठण जन बुल्यां बरजात पोड़ गे हो। बामणों क बि बामण त्रिकालदर्शी कर्मकांड प्रवीण माधव नंद पर तो जन चित्तभ्रम क व्यथा फ़ैल गे हो। घन्ना प्रधान , शेर सिंह , रेवतराम सॉकर सब तै झकजोरन लग गेन कि - यदि शिल्पकार जंद्यो पैरण लग जावन तो समझो एवं काल ऐ गे। सरा बिट्ठण तै झकझोर दे अर सबि बिट्ठ ग्लानि अर अपमान की भावना म बगण लग गेन। बिट्ठ बि माधवा नंद की हुंकार से प्रभावित ह्वेन कि शिल्पकारों न कन निर्णय ले ? कन शिल्पकार बिट्ठों सकासौरी कौर सकदन ? आज जंद्यो , भोळ शिल्पकार नामकरण , पूजा करण लग जाल। घन्ना प्रधान क डेर निर्णय ह्वे कि कै बि प्रकार से शिल्पकारों द्वारा जनेऊ धारण अभियान तै रोके जाय कि भोळ बिटेन क्या अबि से क्वी बि शिल्पकार जंद्यो पैरण लैक नि राओ।
दुफरा भोजन कोरी प्रसन्नता से गंगाराम आर्य , जितार सिंह नेगी व गांवक द्वी युवा दुसर गाँव म जंद्यो पैरणो कार्यकर्म हेतु चल गेन।
यी लोग द्वी एक मील गे इ ह्वाल कि त्रिकालदर्शी माधवा नंद को नेतृत्व म लठैत टाइप क युवा जन दक्खू , दाताराम , भरतु सिंग आदि शिल्पकार टोला ऐन अर लाठी बल पर पांच छै शिल्पकारों क जंद्यो तोड़ि टुट्यां जंद्यो लेक गुदनड़ जिना जाण लग गेन. किंतु माधवा नंद न रोक बल - द्याखौ द्याखौ जंद्यो भगवान को रूप हूंद तो जंद्यो तै गंदा स्थल म नि चुटाण , बिलकुल ना। तो लठैतों न जंद्यो इना ऊना चुलै दे। जंद्यो भंजन से बिट्ठ प्रसन्न ह्वेक चल गेन। तो शिल्पकार टोलाम श्मशान की कुशान्ति ऐ गे। सार्वजनिक अपमान क घूँट विष से बि संतापशाली हूंद। सब परिवार अथाह शोक म डूब गेन। दिवाली मनाणो सब इच्छा मर गे। संताप म बि क्वी दिवाली मनांद ? अपमान न सब्युंक भूक तीस छीन ले। भौत सा बिठलड़ रूण लग गेन अर बुड्यों क बि अंसदरि बगणा छा। निराशा , अपयश , अपमान को घूँट।
पर संध्या हूंद हूंद रैजा जी म दृढ साहस जाग अर सकारात्मक भाव संचार हूण लग गेन। रैजा जीन सब तै ढाढ़स बंधाइ अर ब्वाल कि यदि समानता चएंदी तो बकळि जिकुड़ी चयेंद। रैजा जीन बताई कि भोळ सुबेर नयाणो उपरान्त पुनः यज्ञोपवीत संस्कार होलु। कुछ न पूछ जु पुनः बिट्ठ जंद्यो तुड़नो आला तो ?
प्रश्न बड़ो प्रासंगिक छौ। शिल्पकारों म शिल्प च किंतु धन , भूमि तो बिट्ठों म च तो बिट्ठों दगड़ अनबन , युद्ध चलण कठिन ही होलु। रैजा जीन सुरक से रणनीति बताई। रैजा जीक सुझाव से रात शिल्पकार टोला म द्यू बत्ती अर दिवळ छिल्ल से दिवाली मनाये गे। समाज म जब क्वी सकारात्मक पुरुष मिल जाओ तो दुःख , अपमान बि आशा, आत्मविश्वास म बि परिवर्तित ह्वे जांद। रैजा जीन शिल्पकार टोला म आशा व भरोसा जाएगी दे।
दुसर दिन घाम आणो उपरान्त सब पुरुष युवा , बुड्या नए धुएँक ऐना अर रैजा जीन ॐ भूर्भुव स्वः ,,, मंत्र द्वारा जनेऊ पेराई। जनेऊ पूर नि ह्वेन तो धागा ही पैरे गे। सब पुनः प्रसन्न ह्वे गेन। बात बिठण पॉंच अर ब्याळि तरां माधवा नंद त्रिकालदर्शी क नेतृत्व म बिट्ठण बिटेन लठैत जंद्यो तुड़नो ऐ गेन। किन्तु आज शिल्पकार रणनीति बणैक तयार छा। भौत सा युवाओं अर प्रोढ़ोंन लाठी निकाळ देन। रणनीति क अंतर्गत शक्तिशाली युवा शिल्पकार किसनी न माधवा नंद पकड़ अर द्वीउन घन्ना प्रधान पकड़ अर निकट क गुदनड़ जिना ल्हसोरण लग गेन। रैजा जीन ऊँची ध्वनि म ब्वाल - किसना १ माधवा गुरु क गिच्च पुटुक गोरु क हडक कोच अर बकै घन्ना प्रधान गिच्च पुटुक गू कोचों। एक द्वी शिल्पकारों न अन्य द्वी चार बिट्ठों पर लाठी बि चले दे। बिट्ठ इन आक्रमण कुण कतई तत्पर नि छा।
रैजा क बचन सुणन छौ कि माधवा नंद त्रिकालदर्शी रुवांसा ह्वेक किराइ - हे म्यार तो धर्म भ्रस्ट ह्वे जाल। तुमर खुट पोड़द मि।
घन्ना प्रधानन बि रूंद रूंद बुलण लग गे - तुमर खुट म पोड़लु मै छोड़ द्यावो।
रैजा जीन ब्वाल - तो हमर जंद्यो नि तोड़ल्या ना ?
माधवा नंद अर घन्ना न जोर से ब्वाल कसम से ना ना। पैरो जथगा जंद्यो पैरणाई पैरो।
अर अचाणचक सब कुछ संधि म परिवर्तित ह्वे गे। माधवा नंद न बोल - पर प्रार्थना च यिन घटना की छ्वीं क्खी नि लगैन।
सब शिल्पकारों न सौ खैन ।
बिट्ठ तो यिन घटना क चर्चा कर नि सकदन किलैकि भयंकर लज्जा जि छे यिं घटना म।
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2024-
कथा - भीष्म कुकरेती
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दिखे जाव तो सलाण म गढ़देश गाँव म शिल्पकारों द्वारा जंद्यो पैरण आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन से बि बड़ आंदोलन च किंतु ना ही शिल्पकार खुलेआम अर बिट्ठ चुपके से बि जंद्यो आंदोलन की छ्वीं लगांदन।
शुरू बिटेन हिन्दू समाज लचीला समाज च। समय समय पर सुधारवादी कुछ न कुछ सुधार लाणा रैन अर हिन्दू समाज तै सदा जीवंत समाज बणाना रैन। जातीय भेदभाव व भूमि पर कुछ लोगों अधिकार एक बड़ी कमजोरी हिन्दू समाज की च।
ब्रिटिश काल म हिन्दू समाज म भौत सा सुधारवादी आंदोलन चलिन। उत्तराखंड म शिल्पकार आत्मधिकार संबंधी एक बड़ो आंदोलन चल -आर्यसमाज आंदोलन। भौत सा आर्यसमाजी सामजिक कार्यकर्ताओं न शिल्पकारों तैं प्रेरित कार कि जातीय जकड़न छोड़ि आर्यसमाजी बण जाओ अर वैदिक कर्मकांड तै अपनाओ जन हवन करण , जंदेउ धारण करण अर मूर्ति पूजा क सर्वथा त्याग।
गढ़देश गाँव म बिट्ठ बि रौंद छा तो शिल्पकार बि। शिल्पकारों म ल्वार , टमटा , सुनार , काष्ठकर्मी छा तो सामान्य श्रमिक बि। छुवाछूत अंदादुंद अर छुवाछूत जीवित रखणो ततकथित उच्च वर्ग भौत सा सामजिक , वैदिक नियमों क सौं घटि या उदारण दींदा रौंद छा।
इनम गढ़वाल म आर्य समाज आंदोलन न शिल्पकारों तै प्रभावित तो कार च किन्तु तै बिट्ठ वर्ग म खलबली बि मचाई।
गढ़देश गाँव म जब बिंजोली चौंदकोट का गंगाराम आर्य जन्म चक्षुविहीन , कांडी उदयपुर का उमराव सिंह नेगी क प्रयास से शिल्पकारों न आर्य समाज अपनाणो निश्चय कार। गंगाराम आर्य न आर्य समाजी बामण की भूमिका निभाई अर सब तै हवन करण सिखाई व सब मर्दों तेन जंद्यो पेराई, अर जप करणों कुण गायत्री मंत्र ओम भूर्भुव स्व: तत्सवि तुवरिण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् रटाई। केवल रैजा आर्य जो तिसर पास छा न इ मंत्र याद कार साक तो रैजा जी तै ागधदेश गांव म समाज क बामण अर्थात प्रतिनिधि घोसित करे गे। रैजा जी म कुछ अतिरिक्त जंद्यो बि दिए गेन कि
गढ़देश गाँव म लोहार अर टमटों न पैली बार जंद्यो धारण कार तो सदियों से जंद्यो से बंचित ये समाज म नई ऊर्जा संचारित हूण लग गे। ऊर्जा, प्रसन्नता इन छे जन बुल्यां भारत म स्वतंत्रता ऐ गे हो। सामान्य जिंदगी उत्साह , प्रसन्नता , अति आनंद म परिवर्तित ह्वे गे अर घर घर म स्वाळ -पक्वड़ पकाये गेन अर क्वी बि शिल्पकार तेल -घी -गुड़ हेतु मांगणों बिट्ठण नि गे जनकि सामान्य त्यौहार म बिट्ठों से माँगि -देखि स्वाळ -पक्वड़ पकाये जांद छा। शिल्पकार ही जणदा छा तेल , आटो , दाळ मसाला मंगण म क्या क्या अपमान साहन करण पड़दो छौ। त्यौहार से पैलि स्वाळ -पक्वड़ हेतु सामान निडाण म महिलाओं तै सबसे बिंडी अपमान साहन करण पोड़द छौ। कुछ शिल्पकार महिला बिट्ठों क अग्रिम श्रम कौरी निश्चित कर लींदा छा कि त्यौहार से पैल ठाकुर (बिट्ठ ) कथगा तेल , गुड़ , ग्युं क आटो , मसाला द्याला। निथर भविष्य म श्रम करणों निश्चित करे जांद छौ अर द्वी अवसर पर इन न तन म अपमान तो मिल्दो ही छौ शिल्पकारों तै। दिखे जाय तो यु शिल्पकारों अपमान करण एक प्रकारौ नियम ही मने जांद छौ।
आज जंद्यो पैरणों प्रसन्नता म सभी घर म स्वाळ -पक्वड़ पकिन किन्तु सहकारिता बल पर स्वाळ -पक्वड़ पकाये गेन। कै बि शिल्पकार तै तेल -मसाला -आटो बान कै बि दिवा या निदिवा बिट्ठ क देळिम मंगणों खड़ हूणो आवश्यकता नि पोड़। अपने आप म या बि सहकारिता क क्रान्ति ही छे शिल्पकारों मध्य। समाज क प्रत्येक वर्ग , छुट -बड़ , बूड -बुड्या -बुडड़ी -युवती , बैक स्त्री मंगलमय समय क ही बात करणा छा कि हम शिल्पकारों न जप , , हवन कर्मकांड कार अर जंद्यो पैर। संभवतया सदियों से मूल अधिकारों से बंचित समाज तै इन लग कि यु समाज अब कुछ सीमा तक बिट्ठ समाज क नरोबर ऐ गे। उमंग , भविष्य म बिट्ठ सामानता क सुपिन , उत्साह सरा शिल्पकारटोला म पसर गे छौ। युवाओं म तो बिंडी उमंग उत्साह , ऊर्जा आयीं छे तो ऊन सरसरी म मंडाण बि उरे दे। आज क पाठकों व लोगों तै बचकाना लगल किंतु ऊं तै पूछो जौं तैं प्रत्येक क्षण छुवाछूत क दंश भुगतण पोड़ हो। जंद्यो पैरण से छुवाछूत समाप्त नि ह्वे ह्वेलि किंतु शिल्पकारों म अपार आत्मभिमान व आत्म विश्वास तो आयी च तभी तो स्वतः ही त्यौहार को वातावरण बण गे छौ। यु बि निर्णय ह्वे कि रात दुयु जळाये जाल अर ये वातावरण म दिवाली त्यौहार जन वातावरण बि जुड़े जाओ। कुछ युवा तो मथि डांड चल गेन कि कुंळैक दिवळ छिल जळैक दिवाली मनये जाय।
इख शिल्पकार टोला म ाँद , अपार प्रसन्नता , आशा प्रसारित हुईं छे तो मथि बिट्ठण जन बुल्यां बरजात पोड़ गे हो। बामणों क बि बामण त्रिकालदर्शी कर्मकांड प्रवीण माधव नंद पर तो जन चित्तभ्रम क व्यथा फ़ैल गे हो। घन्ना प्रधान , शेर सिंह , रेवतराम सॉकर सब तै झकजोरन लग गेन कि - यदि शिल्पकार जंद्यो पैरण लग जावन तो समझो एवं काल ऐ गे। सरा बिट्ठण तै झकझोर दे अर सबि बिट्ठ ग्लानि अर अपमान की भावना म बगण लग गेन। बिट्ठ बि माधवा नंद की हुंकार से प्रभावित ह्वेन कि शिल्पकारों न कन निर्णय ले ? कन शिल्पकार बिट्ठों सकासौरी कौर सकदन ? आज जंद्यो , भोळ शिल्पकार नामकरण , पूजा करण लग जाल। घन्ना प्रधान क डेर निर्णय ह्वे कि कै बि प्रकार से शिल्पकारों द्वारा जनेऊ धारण अभियान तै रोके जाय कि भोळ बिटेन क्या अबि से क्वी बि शिल्पकार जंद्यो पैरण लैक नि राओ।
दुफरा भोजन कोरी प्रसन्नता से गंगाराम आर्य , जितार सिंह नेगी व गांवक द्वी युवा दुसर गाँव म जंद्यो पैरणो कार्यकर्म हेतु चल गेन।
यी लोग द्वी एक मील गे इ ह्वाल कि त्रिकालदर्शी माधवा नंद को नेतृत्व म लठैत टाइप क युवा जन दक्खू , दाताराम , भरतु सिंग आदि शिल्पकार टोला ऐन अर लाठी बल पर पांच छै शिल्पकारों क जंद्यो तोड़ि टुट्यां जंद्यो लेक गुदनड़ जिना जाण लग गेन. किंतु माधवा नंद न रोक बल - द्याखौ द्याखौ जंद्यो भगवान को रूप हूंद तो जंद्यो तै गंदा स्थल म नि चुटाण , बिलकुल ना। तो लठैतों न जंद्यो इना ऊना चुलै दे। जंद्यो भंजन से बिट्ठ प्रसन्न ह्वेक चल गेन। तो शिल्पकार टोलाम श्मशान की कुशान्ति ऐ गे। सार्वजनिक अपमान क घूँट विष से बि संतापशाली हूंद। सब परिवार अथाह शोक म डूब गेन। दिवाली मनाणो सब इच्छा मर गे। संताप म बि क्वी दिवाली मनांद ? अपमान न सब्युंक भूक तीस छीन ले। भौत सा बिठलड़ रूण लग गेन अर बुड्यों क बि अंसदरि बगणा छा। निराशा , अपयश , अपमान को घूँट।
पर संध्या हूंद हूंद रैजा जी म दृढ साहस जाग अर सकारात्मक भाव संचार हूण लग गेन। रैजा जीन सब तै ढाढ़स बंधाइ अर ब्वाल कि यदि समानता चएंदी तो बकळि जिकुड़ी चयेंद। रैजा जीन बताई कि भोळ सुबेर नयाणो उपरान्त पुनः यज्ञोपवीत संस्कार होलु। कुछ न पूछ जु पुनः बिट्ठ जंद्यो तुड़नो आला तो ?
प्रश्न बड़ो प्रासंगिक छौ। शिल्पकारों म शिल्प च किंतु धन , भूमि तो बिट्ठों म च तो बिट्ठों दगड़ अनबन , युद्ध चलण कठिन ही होलु। रैजा जीन सुरक से रणनीति बताई। रैजा जीक सुझाव से रात शिल्पकार टोला म द्यू बत्ती अर दिवळ छिल्ल से दिवाली मनाये गे। समाज म जब क्वी सकारात्मक पुरुष मिल जाओ तो दुःख , अपमान बि आशा, आत्मविश्वास म बि परिवर्तित ह्वे जांद। रैजा जीन शिल्पकार टोला म आशा व भरोसा जाएगी दे।
दुसर दिन घाम आणो उपरान्त सब पुरुष युवा , बुड्या नए धुएँक ऐना अर रैजा जीन ॐ भूर्भुव स्वः ,,, मंत्र द्वारा जनेऊ पेराई। जनेऊ पूर नि ह्वेन तो धागा ही पैरे गे। सब पुनः प्रसन्न ह्वे गेन। बात बिठण पॉंच अर ब्याळि तरां माधवा नंद त्रिकालदर्शी क नेतृत्व म बिट्ठण बिटेन लठैत जंद्यो तुड़नो ऐ गेन। किन्तु आज शिल्पकार रणनीति बणैक तयार छा। भौत सा युवाओं अर प्रोढ़ोंन लाठी निकाळ देन। रणनीति क अंतर्गत शक्तिशाली युवा शिल्पकार किसनी न माधवा नंद पकड़ अर द्वीउन घन्ना प्रधान पकड़ अर निकट क गुदनड़ जिना ल्हसोरण लग गेन। रैजा जीन ऊँची ध्वनि म ब्वाल - किसना १ माधवा गुरु क गिच्च पुटुक गोरु क हडक कोच अर बकै घन्ना प्रधान गिच्च पुटुक गू कोचों। एक द्वी शिल्पकारों न अन्य द्वी चार बिट्ठों पर लाठी बि चले दे। बिट्ठ इन आक्रमण कुण कतई तत्पर नि छा।
रैजा क बचन सुणन छौ कि माधवा नंद त्रिकालदर्शी रुवांसा ह्वेक किराइ - हे म्यार तो धर्म भ्रस्ट ह्वे जाल। तुमर खुट पोड़द मि।
घन्ना प्रधानन बि रूंद रूंद बुलण लग गे - तुमर खुट म पोड़लु मै छोड़ द्यावो।
रैजा जीन ब्वाल - तो हमर जंद्यो नि तोड़ल्या ना ?
माधवा नंद अर घन्ना न जोर से ब्वाल कसम से ना ना। पैरो जथगा जंद्यो पैरणाई पैरो।
अर अचाणचक सब कुछ संधि म परिवर्तित ह्वे गे। माधवा नंद न बोल - पर प्रार्थना च यिन घटना की छ्वीं क्खी नि लगैन।
सब शिल्पकारों न सौ खैन ।
बिट्ठ तो यिन घटना क चर्चा कर नि सकदन किलैकि भयंकर लज्जा जि छे यिं घटना म।
लिखवार कथा क सत्यता पर क्वी उत्तरदायित्व नि लींदो
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2024
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