डॉ. प्रीतम अपाछ्याण : सतसई शैली को पुनर्जीवित करने वाले कवि (700 दोहे)
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साहित्य इतिहासकार भीष्म कुकरेती
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डॉ. प्रीतम अपाछ्याण ने गढ़वाली साहित्य के विकास में कई तरह से योगदान दिया। डॉ. प्रीतम अपाछ्याण ने क्षेत्रीय पत्रिका संपादकों को लोक साहित्य एकत्र करने में मदद की, पत्रिकाओं का संपादन किया और गढ़वाली कविताएं, कहानियां, उपन्यास आदि रचे।
डॉ. प्रीतम अपाछ्याण का जन्म 1974 में गरकोट, कर्णप्रयाग, चमोली गढ़वाल में हुआ था। डॉ. प्रीतम अपाच्यन हिंदी और गढ़वाली साहित्य के रचयिता हैं।
डॉ. प्रीतम अपाछ्याण ने गढ़वाली कविता संग्रह प्रकाशित किए-
चकोर
उमर बूंदा जा
डॉ. प्रीतम अपाछ्याण
डॉ. प्रीतम अपाछ्याण के कहानी संग्रह (कथा गली कटपाटी, घटना) और उपन्यास (याकुलांस, भ्यात, घट) छप रहे हैं।
दूरदर्शन और आकाशवाणी से नियमित रूप से डॉ. प्रीतम अपाछ्याण की कविताएं और साक्षात्कार प्रसारित होते थे। डॉ. प्रीतम अपाछ्याण ने कविता के लिए सामाजिक मुद्दे, पर्यावरण और वर्ग संघर्ष जैसे कई विषय लिए। प्रीतम ने दोहे और अपारंपरिक तरीकों से कविताएं रची। हालांकि दोहे डॉ. प्रीतम अपाछ्याण की प्रमुख काव्य शैली रही है। भजन सिंह सिंह, अबोध बंधु बहुगुणा जैसे साहित्यकारों ने अतीत में सतसई (एक संग्रह में 700 या उससे अधिक दोहे) की रचना की। अब प्रीतम अपाच्यन ने प्रीतम सतसई (729 दोहे) प्रकाशित कर उसी शैली को पुनर्जीवित किया है। उमेश चमोला, मदन डुकलान और कविता विशेषज्ञ डॉ. मंजुला एन. ढौंडियाल जैसे आलोचकों और साहित्यकारों ने गढ़वाली कविता में दोहे और सतसई शैली (700 दोहे) को पुनर्जीवित करने के लिए डॉ. प्रीतम अपाछ्याण के प्रमुख योगदान की सराहना की।
डाळि लाणि छ्वीं
डाळि सुड़सुड़ी द्वी धार मा खड़ी
लाणि खड़ाखड़ी छ्वीं घड़ी द्वी घड़ी
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जुम्म टटगरीं दीदी चुप्प क्यो छई
गुम्म सोचूं मा छै क्या बानि का गई
का च वो फफराट तेरू ब्याळि छै कनू
पात वा ससराट कख आज कै जनू?
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ठुस्स बोल हे निहोण्यां क्यो छै भट्याणी
छुयांळ कंदूड़ खड़ा कर्दि निखाणी
दानु ह्वे सरेल खुटा क्वीना मुड़ेगे
बीतिगे बसंत सैरा फांगा बुढ़ेगे
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घौ घचोरियालि भुली छ्वीं लगाण मा
सोचि पोड़दा चौळा चीरा मन पराण मा
कख बथौं मि छट्ट छुट्यां फपरट्या दिन
कखन् ल्हौं मि बारा रितूं का खिगतट्या दिन?
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बीज थौ उड़ीक अयूं घर सिमार मा
घाम पाणि प्येकि जम्यूं गौं कि सार मा
पुळै पतै पाळि पोषि पैलि पधान
धार फेर रोपिगे मी देबी का थान
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दोपति चौपति जुगा बाळि सि छौ मी
दोफंगी चौफंगी वळी माळि सि छौ मी
कोंपळा कुटमुणा ऐनि धार सुघाण
फूलणू ज्वानी कु छै प्यार पवाण
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बोल कना बीत्या दिन फेर अगनईं
हौर क्यक्या देखि तिन दिन पिछनईं
कै पंजाळिना लगैनि त्वे फरैं सि घौ
कै चंडाळ ना दुखैनि त्वे फरैं सि घौ?
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ज्वानि की फुलार बक्की थामि साकि नी
शरम की उलार छक्की बाच बाकि नी
फुल्यार्यूं की हतकंड्युं तैं झाड़े मिन फूल
नौन्याळु की बंद मुठ्युं तैं सार्ये मिन शूल
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ज्वांद बांद स्वारा भारा मीमु सबी ऐ
हुड़क्या बंदुक्या थौ खाणा कू बट्वे सबी ऐ
जरा जरा की औंण लगे ऊछा चिलकरा
पछाणि नी साकि बैरि मिन खाडकरा
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ठंगरा बोलि कत्यूंन मेरा फांगा गिंडाये
फूल चुंड्या पात चीम्या छौंकि मुंडाये
क्वी अधर्मि गेळ बटे छाल रै खोन्नू
क्वीत केड़ा कांडा जमै जैड़ा रै सोन्नू
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धौ नि ह्वे त निर्भग्यूंन् चम्म लगै बणांग
मी दगड़ी हौरि डाळि बैणि फुके आग
रिंगळा पिंगळा फूल कैका फौंका हलकदा
भसम छ्यूंता अंगरा बीज जौग्या जलमदा
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मृग हिरण घ्वीड़ हर्चि सूनि चांथ रै
चखुला रैबार्या नि बौड़ा घोल कांडा रै
झणि किलै जि रै मि ज्यूंदि खड़ी धार मा
पूछि त्वैन निहळो ह्वों मि यना उलार मा
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मरि बि जौंलु धार देबि अब तु ह्वे गिनी
छुयों मा ही धारै डाळि दुई स्ये गिनी.
डॉ. प्रीतम अपाछ्याण


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