GHARWALI STORY

जब बेडु बारों मासा पकते हैं तो उसने क्यों नहीं चखे ?
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आख्याननुमा कथा - भीष्म कुकरेती
(Short Stories Beyond Garhwal )
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एक द्वी वर्ष मीन बिनकारण , नासमझी म फिल्म उद्योग म क्षय करीन। मि तबक फिल्म निर्माता , म्यार दगड्या मनमोहन जखमोला क ओफिस म प्रतिदिन जांद छौ जख प्रत्येक मनिख इख तक कि स्पॉट ब्वाय या चाय दीण वळ बि हिट फिल्म क दिन म सुपिन दिखुद छौ। फिल्म प्रोडक्शन ओफिस अर्थात सुपिन , दिवास्वप्न , आकांक्षा अभिलाषा , कामना , मनोकामनाओं क कार्यालय हूंद। फिल्म प्रोडक्शन कार्यालय अर्थात जख वर्तमान म अमिताभ बच्चन वर्ल्ड वाइड हिट फिल्म क सुपिन द्याखौ।
जब क्वी नै फिल्म प्रोड्यूसर फील ओफिस ख्वालो तो तख कार्य कम छ्वीं अधिक लगदन। आकांक्षा सब गप /छ्वीं म परिवर्तित ह्वे जांदन। अधिकतर छ्वीं सफल कलाकारों कारनामों क ही हूंदन अर प्रत्येक इन बुल्दन जन बुल्यां या घटना तैकि समिण ह्वे हो। मीम दसियों फ़िल्मी घटनाओं कुटरी च जु मीन मनमोहन जखमोला क फिल्म ओफिस म सुणिन । समय ालो तो बतौल।
मनमोहन क फिल्म प्रोक्सन एक्जीक्यूटिव छाया 'राव साब '.
'राव साब ' तै सब 'राव साब ' ही बुल्दा छा जो कर्नाटक का छा अर फिल्म उद्योग म सकारात्मक नाम छौ प्रोडक्शन संबाळणम। हिट फिल्म मधुमती क सि प्रोडक्शन मैनेजर छा. महान निदेशक बिमल रॉय आदि क दगड़ कार्य को अनुभव छौ तो 'राव साब ' पर बि भाग्यशाली हिट मैन को ठप्पा छा लग्युं। मिठ बुलण व मितव्ययी बुलण वळ। भौत कम आवेश म आंद छा। हिंदी फिल्मों क़िस्साओं क भंडार छा।
एक दिन 'राव साब ' हम द्वी तीन लोगों तै 'मधुमती' फिल्म क फिल्मांकन व तब पहाड़ों म पहाड़ों विशेषकर उत्तराखंड म फिल्मांकन म बिजली व बौण म जाणों परिहवन की समस्या की छ्वीं लगाणा छा।
मीन जब बोल कि मि गढ़वाल को छौं तो ' राव साब ' क मुख बिटेन निकळ , " पहाड़ी घर अर पहाड़ी जल सोत आशचय्जनक ! गर्मियों म द्वी ठंडा अर शीत समय , घर भि छोया बि गरम। " मधुमती क शूटिंग घोड़ाखाल , नैनीताल म ह्वे छौ तो 'राव साब ' तैं पहाड़ों की भौत सा ज्ञान ह्वे अर कुछ याद बि छौ।
छ्वीं लगांद लगांद अचाणचक 'राव साब न पूछ दे " कुकरेती जी जब बेडु बारा मासा पकते हैं तो उसने क्यों नहीं चखे ?"
मि चकरै ग्यों कि यि कन प्रश्न च जो बेडु -काफल से संबंधित च।
तब 'राव साब' न कुमाऊंनी लोक गीत सुणाइ ," बेडु पाको बारा मासा काफल पाको चैतो मेरी छैला , मीन नि चाखो। "
अब म्यार बिंगण म आयी कि जब बेडु बारा मास पकद तो मीन किलै नि चाख ?
तब मीन व्याख्या कार कि " वास्तविक गीत च बेडु पाको बड़ा मासो। और बड़ा मास का अर्थ होता है जेठ "
'राव साब न ब्वाल , थैंक यु नहीं तो मैं बहुत बार सोचता था बेडु बारह महीने पकता रहता है। बेडु अर्थात फिग ना ? हमारे इधर बेलारी -कलबुर्गी में बहुत होते हैं। काफल मैंने नैनीताल के अतिरिक्त कहीं और जगह नहीं देखे।
मीन ब्वाल - हां बेडु अर्थात फिग।


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